Noida News : नोएडा प्राधिकरण की नीतियों पर संजीव पुरी ने उठाया सवाल

Apr 11, 2026 - 14:33
Noida News : नोएडा प्राधिकरण की नीतियों पर संजीव पुरी ने उठाया सवाल

Noida News : नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को लेकर शहरवासियों में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। प्राधिकरण की स्थापना 17 अप्रैल 1976 को हुई थी, जिसके बाद यहां दिल्ली समेत विभिन्न राज्यों से आए लोगों को उद्योग, आवास और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए गए। उस समय आवासीय और औद्योगिक योजनाएं लॉटरी प्रणाली के माध्यम से संचालित होती थीं, जिससे आम नागरिकों को भी लाभ मिला।

हालांकि, पंजाबी विकास मंच के डिप्टी चेयरमैन एवं सेक्टर-56 के पूर्व आरडब्ल्यूए अध्यक्ष संजीव पुरी का आरोप है कि पिछले 7-8 वर्षों में प्राधिकरण की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव आया है और अब यह आमजन की बजाय लाभ-केंद्रित संस्था की तरह काम कर रहा है।उन्होंने बताया कि पहले वन टाइम लीज रेंट 11 वर्षों के लिए एकमुश्त लिया जाता था, जिसे बढ़ाकर अब 15 वर्ष कर दिया गया है। इसके अलावा, पहले प्लॉट आवंटन लॉटरी के माध्यम से होते थे, लेकिन अब नीलामी प्रक्रिया लागू होने से मध्यम वर्ग की पहुंच से प्लॉट बाहर हो गए हैं।

संजीव पुरी ने यह भी आरोप लगाया कि सेक्टरों में वेंडर जोन बनाए जा रहे हैं और मध्यम वर्गीय घरों पर धारा-10 के नोटिस चिपकाए जा रहे हैं, जिससे लोगों में असंतोष है। वहीं मिक्स्ड लैंड यूज के लिए कन्वर्जन चार्ज भी बढ़ा दिए गए हैं। पहले जहां यह शुल्क 10 प्रतिशत था, अब इसे औद्योगिक क्षेत्र में 25 प्रतिशत और रिहायशी क्षेत्र में 50 प्रतिशत तक कर दिया गया है। हालांकि हाल ही में किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल को प्राधिकरण की ओर से आश्वासन दिया गया है कि 5 प्रतिशत भूखंडों पर पुराने नियम ही लागू रहेंगे, जिसे सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

शहर के विभिन्न संगठनों जैसे फोनरवा, एनईए और डीडीआरडब्ल्यूए की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि ये संगठन अब तक प्राधिकरण के समक्ष प्रभावी तरीके से अपनी बात नहीं रख पाए हैं।स्थानीय नागरिकों का यह भी सवाल है कि जनप्रतिनिधि, जिन्हें उन्होंने भारी मतों से चुना, क्या वे इन मुद्दों पर संज्ञान ले रहे हैं या नहीं। शहरवासियों का आरोप है कि प्राधिकरण की नीतियों के कारण मध्यम वर्ग और आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है। नोएडा के नागरिकों का कहना है कि वे लंबे समय से एक ही राजनीतिक दल का समर्थन करते आए हैं, इसके बावजूद उन्हें वर्तमान नीतियों से राहत नहीं मिल रही है, जिससे असंतोष और भी गहरा होता जा रहा है।