Noida News : "जेवर एयरपोर्ट के असली हीरो"
Noida News : जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनकर तैयार है। आगामी 28 मार्च को भारत के प्रधानमंत्री इसका उद्घाटन करेंगे। इसके बाद यहां से उड़ान शुरू हो जाएगी। इस एयरपोर्ट के बनने में अहम भूमिका निभाने वाले हीरो को हम भूल नहीं सकते। यह असंभव कार्य देखने में आज जितनी सरल लग रहा है, उतना आसान नहीं था। क्योंकि जब एयरपोर्ट के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण की बात शुरू हुई तब इस क्षेत्र में अधिग्रहण करना एक टेढ़ी खीर थी। कुछ समय पूर्व इसी क्षेत्र में भट्ठा पारसोल कांड हुआ था, और अधिग्रहण को लेकर इस क्षेत्र के किसान लगातार आंदोलन कर रहे थे। इसके बावजूद भी तत्कालीन जिलाधिकारी बीएन सिंह और उनकी टीम ने एक संयुक्त अभियान के तहत ऐसा कार्य किया, जिसने इतिहास रच दिया।
उत्तर प्रदेश में यह पहली बार हुआ जब अधिग्रहण की जद में आए किसानों ने अधिग्रहण का विरोध नही किया, और ना ही किसी तरह का विवाद हुआ। किसानों ने स्वेच्छापूर्वक सहमति से अपनी जमीनी दी। मुआवजा लिया और गांव को खाली कर दिया। यह ऐसे संभव नहीं हुआ। उस समय तैनात अधिकारियों ने जिस तरह से किसानों से संवाद किया, उनके दुख-सुख का ध्यान रखा, उनकी समस्याओं को सरकार तक पहुंचा और उसका निराकरण करवाया, यही वजह रही कि किसानों ने अधिकारियों पर विश्वास किया और आज समय का बोया गया जेवर एयरपोर्ट रुपी बीज एक वृहद रूप ले चुका है।
अधिग्रहण के बारे मे हमारे संवाददाता द्वारा आज पूछे गए एक सवाल के जवाब में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी तथा तत्कालीन डीएम बी सिंह ने कहा कि मेरे कार्यकाल में जो भूमि-अधिग्रहण चरण पूरा हुआ, वह फेस-1 था, जिसमें छह गांवों की कुल 1,334 हेक्टेयर भूमि शामिल थी। इसमें ग्राम दयानतपुर, रोही, पारोही, रन्हेरा, किशोरपुर और बनवारीबास थे। आज यह परियोजना एक नए पड़ाव पर है। डीजीसीए ने 6 मार्च 2026 को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को एयरोड्रोम लाइसेंस दिया और आधिकारिक स्रोतों के अनुसार प्रथम चरण की क्षमता लगभग 1.2 करोड़ यात्रियों प्रति वर्ष की है। माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा 28 मार्च के उद्घाटन की तैयारियां चल रही हैं।
जेवर एयरपोर्ट बनने मे असली हीरो कौन है इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मेरे लिए इस परियोजना के असली हीरो सबसे पहले जेवर क्षेत्र के किसान, प्रभावित परिवार और ग्राम समुदाय हैं। प्रशासन, यमुना विकास प्राधिकरण, राज्य सरकार, राजस्व विभाग, पुलिस, सर्वे टीमें और बाद की कार्यान्वयन एजेंसियां महत्वपूर्ण सहयोगी अवश्य थीं, पर इस परियोजना की नैतिक और मानवीय नींव किसानों के विश्वास पर ही रखी गई। फेस-1 की प्रक्रिया का मूल तत्व संवाद, सहमति, पुनर्वास और समयबद्ध भुगतान था।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भट्ठा-परसौल जैसी पृष्ठभूमि के बाद सबसे बड़ी चुनौती अविश्वास थी। भूमि की कीमत, पुनर्वास, आबादी के भविष्य, दस्तावेज़ी कठिनाइयों, परिवारों के विस्थापन और परियोजना के वास्तविक लाभ को लेकर स्वाभाविक आशंकाएं थीं। प्रारंभिक सहमति प्रक्रिया 1,800 रूपए प्रति वर्गमीटर के आधार पर शुरू हुई थी, लेकिन प्रभावित लोगों में असंतोष था। इसके बाद 3 अगस्त 2018 को मुख्यमंत्री की बैठक हुई, प्रतिकर में 500 रूपए प्रति वर्गमीटर वृद्धि की घोषणा हुई और पैकेज 2,300 प्रति वर्गमीटर तथा पुनर्वास के अधिक स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ा। यही टर्निंग प्वाइंट था। समस्या का समाधान बल से नहीं, बल्कि दर, पुनर्वास, प्रक्रिया और भरोसे के पुनर्संतुलन से निकला।
अधिग्रहण को लेकर किसान संगठनों के दबाव के बारे में पूछेंगे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि दबाव था और वह लोकतांत्रिक समाज में स्वाभाविक भी है। लेकिन मैं इसे “दबाव” से अधिक “सुनवाई की मांग” कहूंगा। आधिकारिक सामग्री के अनुसार मुख्यमंत्री की 3 अगस्त 2018 की बैठक के बाद जिला प्रशासन ने प्रभावित गांवों में लगातार बैठकें कीं और मेरे द्वारा स्वयं जिलाधिकारी के स्तर पर गांवों में जाकर प्रत्यक्ष संवाद किया गया। कुल 5,905 प्रभावित परिवारों में से 4,235 परिवारों, यानी लगभग 72 प्रतिशत ने लगभग 20 दिनों के भीतर सहमति दी। पुनर्वास को इंटीग्रेटेड टाउनशिप रेजिडेंशियल प्लाट और एक परिवार को रोजगार या समकक्ष विकल्प से जोड़े जाने के बाद सहमति तेजी से बढ़ी। इसका अर्थ यह है कि किसान संगठनों से टकराव नहीं, बल्कि नीति में बदलाव, सुझाव तथा संवाद की राह अपनाई गई।
जब उनसे पूछा गया की पहली बार यह हुआ जब छह गांव के किसान अधिग्रहण की जद में आने पर पूरा गांव खाली करके चले गए। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यहाँ एक तथ्य स्पष्ट कर दूँ। मेरे कार्यकाल में पूरा हुआ प्रथम चरण छह गांवों से संबंधित था। विस्थापन का प्रश्न बड़ा था। आधिकारिक अभिलेख के अनुसार लगभग 8,971 परिवार प्रभावित थे और लगभग 3,627 परिवारों के विस्थापन की आशंका थी। इसके लिए जेवर बांगर के पास लगभग 50 हेक्टेयर जगह चिह्नित किया गया। प्रभावित परिवारों के लिए 50 प्रतिशत विकसित आबादी भूखंड, आधुनिक सेक्टर जैसी सुविधाएं, स्कूल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, सामुदायिक ढांचा, रोजगार या 5 लाख का विकल्प, और ट्रांसपोर्ट असिस्टैंट जैसी व्यवस्थाएं जोड़ी गईं। किसान तब तैयार हुए जब उन्हें यह लगा कि उन्हें केवल भूमि-स्वामी नहीं, बल्कि विकास के भागीदार की तरह देखा जा रहा है।
किसानों का भरोसा कैसे जीता गया इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भरोसा भाषणों से नहीं, प्रक्रिया से बनता है। आधिकारिक अभिलेख बताते हैं कि प्रभावित गांवों में सहायता केंद्र स्थापित किए गए, लेखपाल, राजस्व निरीक्षक, डेटा एंट्री ऑपरेटर, फोटोकॉपी मशीन, स्टाम्प विक्रेता, नोटरी, फोटोग्राफर, वाहन और सीसीटीवी तक की व्यवस्था की गई ताकि किसानों को कागज़ी कार्यवाही के लिए दलालों या अनावश्यक खर्च पर निर्भर न रहना पड़े। भुगतान प्रक्रिया को आरटीजीएस के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक और समयबद्ध बनाया गया। सार्वजनिक सूचना गांव, पंचायत, तहसील, जिला कार्यालय, वेबसाइट, और वार रंम जैसे माध्यमों से दी गई। मेरे अनुभव में किसानों का भरोसा तब बना जब प्रशासन उनके गांव गया, उनकी भाषा में बोला, उनकी लागत घटाई और भुगतान को पारदर्शी और कैशलेस बनाया। यही कारण है कि पारदर्शिता और भरोसा इस परियोजना की असली नींव बने।
क्या किसानों के साथ न्याय हुआ। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि किसी भी भूमि-अधिग्रहण में यह प्रश्न अत्यंत गंभीर होता है और इसका उत्तर भी ईमानदारी से देना चाहिए। फेस- 1में सामाजिक प्रभाव, जनता से संवाद, पारदर्शी तरीके से भुगतान, पुनर्वास क्षेत्र की पहचान, रोजगार/एकमुश्त विकल्प और लंबित मामलों में वैधानिक डिपॉजिट, इन सबको प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया। 90 से 92 प्रतिशत प्रभावित किसानों ने सहमति के आधार पर प्रतिकर प्राप्त किया और शेष मामलों में धारा 76/77 के अनुरूप रकम जमा करते हुए 27 जनवरी 2020 तक 100 प्रतिशत भौतिक कब्जा लेने की कार्यवाही पूरी की गई। इसलिए मैं कहूँगा कि उस समय हमारी ईमानदार कोशिश यह थी कि कानून, पारदर्शिता और मानवीय दृष्टि, तीनों साथ चलें। फिर भी, किसानों के वैधानिक हित एक सतत दायित्व हैं। न्याय केवल भुगतान की तारीख तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके बाद सम्मानजनक भागीदारी, पुनर्वास और अवसरों तक फैला होता है।
अगर इस परियोजना की कहानी को एक वाक्य में कहना हो, तो मैं यही कहूँगा: जेवर एयरपोर्ट की पहली और सबसे बड़ी नींव किसानों के विश्वास की थी। प्रशासन की भूमिका उस विश्वास को प्रक्रिया, पारदर्शिता और परिणाम में बदलने की थी।

