Noida News : रंगदारी-धमकी केस में कुख्यात स्क्रैप माफिया रवि काना को अग्रिम जमानत
Noida News : थाना सेक्टर-63 में दर्ज रंगदारी और जान से मारने की धमकी के बहुचर्चित मामले में सत्र न्यायाधीश गौतमबुद्धनगर अतुल श्रीवास्तव की अदालत ने कुख्यात गैंगस्टर रवि काना को बुधवार को अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने 35 हजार रुपये के निजी मुचलके और एक जमानती की शर्त पर गिरफ्तारी की स्थिति में रिहाई का आदेश पारित किया। साथ ही आरोपी को निर्देश दिया गया है कि वह सात दिन के भीतर विवेचक के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करे, किसी भी गवाह को प्रभावित न करे और न्यायालय की अनुमति के बिना देश न छोड़े।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि बहस के दौरान किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध व्यक्तिगत टिप्पणी करना उचित नहीं है। न्यायालय ने कहा कि आरोपी के अधिवक्ता द्वारा पुलिस आयुक्त के खिलाफ की गई व्यक्तिगत टिप्पणी अपमानजनक है और तर्क प्रस्तुत करते समय ऐसी टिप्पणियों से बचा जाना चाहिए।
अभियोजन के अनुसार वादी शैलेन्द्र शर्मा ने 14 जनवरी 2026 को सेक्टर-63 कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। वादी ने आरोप लगाया कि उसका सेक्टर-63 में रिनोक्स ग्रुप के नाम से कार्यालय है और वह बिल्डर का कार्य करता है। रवि काना के सह आरोपी पंकज पाराशर, जो स्वयं को पत्रकार बताता है, वर्ष 2021 से 2024 के बीच उसके विभिन्न प्रोजेक्ट्स की वीडियो बनवाकर उन्हें वायरल करने और प्रोजेक्ट बंद कराने की धमकी देता रहा।
वादी का आरोप है कि भय और दबाव में आकर उसने अलग-अलग माध्यमों से करीब 20 लाख रुपये दिए। 14 अगस्त 2023 को 10 लाख रुपये, 20 अक्तूबर 2023 को 11.96 लाख रुपये तथा 8 जनवरी 2024 को 1.12 लाख रुपये आरटीजीएस/एनईएफटी के माध्यम से रेनबो मीडिया के खाते में ट्रांसफर किए गए। इसके अतिरिक्त पांच लाख रुपये नकद देने और 23 कंप्यूटर व दो लैपटॉप खरीदवाने का भी उल्लेख है। वादी का यह भी आरोप है कि सह आरोपी पंकज पाराशर के कहने पर रवि काना ने कई बार उसे जान से मारने की धमकी दी।
जिला शासकीय अधिवक्ता ब्रह्मजीत भाटी ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ पूर्व में भी कई मुकदमे दर्ज हैं। उन्होंने दलील दी कि वादी द्वारा दी गई धनराशि के बैंक स्टेटमेंट और अन्य दस्तावेज विवेचना में संलग्न हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत आवेदन के समर्थन में शपथ पत्र दाखिल नहीं किया गया, जबकि आवेदन पर आरोपी के हस्ताक्षर हैं। अभियोजन ने अदालत से जमानत याचिका खारिज करने की मांग की।
आरोपी के अधिवक्ता ललित मोहन गुप्ता ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल की नोएडा पुलिस आयुक्त से व्यक्तिगत रंजिश है और उसे झूठे मुकदमे में फंसाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आरोपी ने न तो कोई रंगदारी मांगी और न ही जान से मारने की धमकी दी। बचाव पक्ष का दावा है कि आरोपी को स्वयं अपनी जान का खतरा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालने का स्पष्ट आरोप नहीं है तथा अन्य धाराएं साधारण प्रकृति की प्रतीत होती हैं। प्रकरण की विवेचना प्रचलित है और मामला मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा विचारणीय है। गुण-दोष पर टिप्पणी किए बिना अदालत ने अग्रिम जमानत देने को पर्याप्त आधार माना।
सत्र अदालत से राहत मिलने के बाद नोएडा पुलिस अब इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार अभियोजन अधिकारियों से परामर्श लिया जा रहा है और जल्द ही अग्रिम जमानत निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है।
इस मामले से जुड़ा एक अन्य पहलू भी चर्चा में है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) गौतमबुद्धनगर की अदालत ने बी-वारंट के बावजूद आरोपी को जेल से छोड़े जाने के आरोप पर बांदा के जेल अधीक्षक से स्पष्टीकरण तलब किया था। आरोप है कि 29 जनवरी को बी-वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी को जिला कारागार से रिहा कर दिया गया, जबकि इस मामले में न्यायालयीय कार्यवाही लंबित थी। बताया जा रहा है कि बांदा जेल अधीक्षक की ओर से इस संबंध में अदालत में जवाब दाखिल किया जा चुका है।

